मेरी उपलब्धियाँ

मेरी आयु के चौवन वे साल के पश्चात मै ने मेरी उपजीवीका के साधनों को गौण दर्जा देते हुए, मै ने मेरे पेशे से स्वेच्छा-निवृत्ती ले ली। यह बात तो बहुत पहले से तय थी। केवल एक निश्चित कारण की अभिलाषा थी। सम्राट अशोक के अभिलेखों की पुस्तक मुझे मिली, मै ने वह सुक्ष्मता से पढ़ी, और सम्राट अशोक मेरे दिल पर छा गये। २३०० वर्ष पूर्व इस व्यक्ति के विचार इतने प्रगल्भ रहे थे, निश्चित ही यह व्यक्ति “महान” था। मै ने सोचा, जिस पुस्तक से मै सम्राट अशोक के अभिलेखों को पढ़ रहा हुँ, वह अभिलेख इस भाषा में तो नही लिखे थे, न ही वह लिपी यह थी। मुझे मेरी उपजीवका से अधिक आनंददायी जीवीका मिल गयी। पेशा त्यागने और स्वेच्छा-निवृत्ती अपनाने का वह कारण मुझे मिल गया। …. सम्राट अशोक के अभिलेखों का अध्ययन

स्वेच्छा-निवृत्ती के बाद मै ने सम्राट अशोक के अभिलेख (शिलालेख और स्तंभ लेख) प्रत्यक्ष देखने के लिये भारत-भ्रमण किया। सारे के सारे अभिलेख देखे। गौर से देखे। उनका सही मायने मे अध्ययन किया। अभिलेखों की लिपी, ब्राम्हि लिपी आत्मसात कर ली। और फिर इन सभी अभिलेखों का मूल ब्राम्हि पाठ, देवनागरी लिप्यांतर तथा मराठी अनुवाद, ऐसी एक पुस्तक लिखकर प्रकाशित करी (२०१४)। दस वर्ष के बाद इसी पुस्तक के मराठी अनुवाद की जगह हिन्दी अनुवाद किया और पुस्तक प्रकाशित करी (२०२३)। …. अध्ययन, लेखन का सिलसिला चलता रहा।

फिर शूरु हुवा संशोधन। सम्राट अशोक के लघु शिलालेखों में देखी गयी २५६ यह संख्या और उसका सही आशय, तथागत बुद्ध का परिनिर्वाण वर्ष

पालि भाषा का अध्ययन भी जारी था। तिपिटक के कई अध्याय पढ़ रहा था। धम्मपद, धम्मचक्कपवत्तन सुत्त और महापरिनिब्बान सुत्त। महापरिनिब्बान सुत्त में वह तीन माह का अवधी, तथागत का अंतिम वर्षावास, परिनिर्वाण की घोषणा और अंत में तथागत का महापरिनिर्वाण। इन बातों का सही निर्धारण तथागत के महापरिनिर्वाण का माह

इन दो उपलब्धियों के बीच एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि मिली।

इस उपलब्धि का चलचित्र मुद्रण किया था। (यहाँ देखे)